खंडवा रोड पर जैसे जैसे होगी बसाहट, बढ़ेगी गर्मी

 खंडवा रोड पर जैसे जैसे होगी बसाहट, बढ़ेगी गर्मी

निमाड प्रहरी 9977766399 

इंदौर (निमाड प्रहरी)   इंदौर में पिछले एक सप्ताह से जिससे बात करो वो गर्मी से परेशान है। कभी शब-ए-मालवा का सेंटर पाइंट था इंदौर, लेकिन अब यहां सडक़ पर निकलने में ऐसा लगता है कि आग में कुद गए हैं।


रात को 9 बजे भी सडक़ पर निकलो तो गर्म हवाएं शरीर से ऐसे चिपकती है जैसे दिन के समय निकल रहे हो। इंदौर का तापमान 45 डिग्री तक पहुंच रहा है, और अभी ये ओर बढ़ेगा। बढ़े भी क्यों नहीं क्योंकि इंदौरी और इंदौर के कथित माई-बाप अंधे जो हो रहे हैं। 1918 में इंदौर का पहला मास्टर प्लान बना था, उसमें इंदौर की सडक़ें ही नहीं तय की थी, इंदौर की आबोहवा कैसे बनी रहेगी इसका भी ध्यान रखा गया था। 100 साल पहले इंदौर की भौगोलिक स्थिति को समझा गया था। इस मास्टर प्लान में ही लिखा है कि मालवा के पठार में उपर की ओर इंदौर बसा है और नीचे निमाड़ है। नर्मदा तट से होती गर्म हवाएं उपर उठने के बाद इंदौर की ओर ही आती हैं। इसलिए इंदौर के खंडवा रोड की ओर के हिस्से में निर्माण को बेहद कम करते हुए इसे जंगल और खेतों से भरा-पूरा रखने के लिए ग्रीन बेल्ट तय किया गया था। यही नहीं इस हिस्से को डेन्सग्रीन करने के लिए नौ लाख पेड लगाकर पूरे क्षेत्र को नौलखा बना दिया गया था। लेकिन आज के बेइमान और पैसों के पीछे भागने वाले तथाकथित समझदारों ने इस पूरे इलाके को कांक्रीट का जंगल बनवा दिया है। यहां के जंगलों को काटा जा रहा है, नई कॉलोनियां बसाई जा रही हैं। यूनिवर्सिटी से लेकर सिमरोल तक नई कॉलोनियां लगातार बस रही हैं। जमीनों के खिलाडियों के लिए इंदौर का ये हिस्सा सोना बरसा रहा है जिसके कुछ टूकड़े इंदौर के कर्ताधर्ताओं के पास भी आ रहे हैं। नतीजा ये हो रहा है कि इंदौर का तापमान निमाड के बराबर पहुंच रहा है। पहले मास्टर प्लान में इंदौर को ठंडा रखने के लिए कान्ह-सरस्वती नदी किनारे बड़े पेड लगवाए गए थे, मुख्य सडक़ों के दोनों और छायादार बड़े वृक्ष लगवए थे। जिनमें से कुछ अभी भी नदी के किनारों पर मौजूद हैं। एनजीटी ने भी नदी किनारे हरियाली करने के लिए कहा था। लेकिन इंदौर के कथित खैरखवाहों ने हरियाली के नाम पर नदी किनारे छोटे-छोटे आर्टिफिशियल पौधे लगा दिए, और सडक़ बनाने के लिए यहां बरसों से खड़े पेडों को काट दिया। ये सब होता रहा और इंदौर वाले उसमें खुशहोकर ताली बजाते रहे। प्रचंड गर्मी से बचने के लिए अब कुछ दिमाग के धनियों ने चौराहों पर छांव के लिए ग्रीन नेट लगवाना शुरू कर दी है, ताकी उनका नाम हो सके। लेकिन ये ज्ञानी सडक़ किनारे पेड लगवाने को तैयार नहीं है। हों भी क्यों आखिर इन्हें गर्मी लगती कहां है क्योंकि ये जिस दफ्तर में बैठते हैं वो एसी से ठंडा रहता है जिस गाड़ी से चलते हैं वो चिल्ड एसी वाली होती है।

इंदौर की 90 फीसदी जनता जो बाइक पर निकलती है उनकी तरह इन्हें भी एक सप्ताह सडक़ पर घूमवाओ तो ये सब हर साल पेड लगाने के फोटो खिंचवाने की नौटंकी के बजाए हकीकत में पेड लगाने लगेंगे। पेड काटने से क्या होता है तब इन्हें पता चलेगा, लेकिन शायद ऐसा होगा नहीं, क्योंकि बात-बात में जुबानी गुस्सा दिखाने वाले इंदौरी अपने हक की बात करने की गर्मी को चापलुसी की बरफ में दबाकर ठंडे हो चुके हैं। ओर ठंडे पड़ चुके लोगों को तो दुनिया से मतलब नहीं रहता है क्योंकि इस तरह के ठंडों का अंत भी गर्मी से ही होता है


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