स्मृति शेष - आशु बक्षी छोटी सी उम्र में स्वाद से ग्राहक और व्यवहार से मित्र बनाये...
स्मृति शेष - आशु बक्षी
छोटी सी उम्र में स्वाद से ग्राहक और व्यवहार से मित्र बनाये...
निमाड प्रहरी-9977766399
गर्मी की एक दोपहर की बात है , तपती दुपहरिया में बाहर निकलने की हिम्मत नहीं थी लेकिन बिटिया का मन होटल रणजीत का मलाई कोफ़्ता खाने का ही था। वह उसकी सबसे पसंदीदा डिश थी , तय किया कि सब्जी होटल से बुला लेते है और बाकि खाना घर पर बन जाये। मैंने आशु को फोन लगाया " भाई ,आपके पास कोई बंदा है जो मलाई कोफ़्ता घर पहुंचा दे। मैंने कहा कि "मैं कहीं दूर हूँ वरना मैं ही आ जाता , उधर से आवाज आई " भैया आप क्यों चिंता करते है ,सब्जी पहुँच जाएगी..."
थोड़ी देर बाद आशु एक प्लेट मलाई कोफ़्ता का पार्सल लेकर खुद ही मेरे घर पहुँच गए। घर पर सभी हैरान थे "भैया, आपने क्यों तकलीफ़ की। कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था तो नहीं भेजते। ऐसी कोई इमरजेंसी भी नहीं थी " सच कहें तो हमें शर्मिंदगी हो रही थी कि इतने छोटे से काम के लिए आशु को तकलीफ़ दी... हम यह जानते है कि आशु के होटल में इतनी भीड़ रहती है कि उसे सर उठाने के फुर्सत नहीं होती और वह एक प्लेट सब्जी के लिए काउंटर से उठकर आ गया... इधर आशु के चेहरे पर बड़े संतोष के भाव थे "भैया ,अपने घर की ही तो बात है ,बिटिया की इच्छा थी तो हम पूरी क्यों नहीं करते..."
यक़ीनन यह घर परिवार की ही तो बात थी। दरअसल आशु के दादाजी बक्षी रघुबीर दत्त साहब के और मेरे दादाजी रायचंद जी नागड़ा से बहुत आत्मीय और गहरे सम्बन्ध थे। इसके बाद मेरे पापा प्रफुल्ल नागड़ा जी और आशु के पापा रणजीत अंकल के ,इधर आशु की मम्मी और मेरी मम्मी भी उतनी ही करीब थी। जिस जगह आज होटल रणजीत है कभी वो नागड़ा विला हुआ करता था जहाँ महात्मा गाँधी जी खण्डवा प्रवास पर रुके थे। बाद में हमारे परिवार ने यह बंगला बक्शी परिवार को बेच दिया। मेरे पापा बताते थे कि आशु के दादाजी रघुबीर दत्त साहब का एक अलग रुतबा था। उस समय खण्डवा में बमुश्किल चार पांच कारें हुआ करती थी जिसमे एक बक्षी साहब के पास थी।
रणजीत अंकल ने शुरुआत तो फर्नीचर के कारोबार से की फिर उनके मन में होटल शुरू करने का विचार आया। उस समय यह बिल्डिंग जनसम्पर्क कार्यालय के पास किराये पर दिया हुआ था जिसे खाली कराने को लेकर लम्बी जद्दोजहद करनी पड़ी। और इसके बाद खण्डवा का पहला पारिवारिक होटल सामने आया जो पूरी तरह वेजिटेरियन था और यहाँ बार भी नहीं था... इसके पहले तक यह धारणा थी कि होटल तो होता ही दारू -मुर्गा के लिए है। इस धारणा को बदला होटल रणजीत ने।
आशु ने पापा के इसी होटल को उन्ही मापदंडो पर चलाया ,रणजीत अंकल सब्जी बाज़ार में खुद थैली लेकर सब्जी खरीदते दिखते थे और अभी उसी भूमिका में आशु था। ज़्यादा बोलने -बतियाने का आशु का स्वभाव नहीं था लेकिन उसके व्यवहार में पूरी आत्मीयता झलकती थी ,महसूस होती थी। यही वज़ह है कि उसने होटल व्यवसाय में जितने ग्राहक नहीं बनाये उससे कहीं ज्यादा मित्र बनाये। आज उसकी अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की भीड़ इस बात का गवाह थी कि उसने क्या कुछ कमाया था... उसके आकस्मिक निधन की खैबर से पूरा शहर ही स्तब्ध था। उसके निधन पर सिर्फ दोस्त ही नहीं डॉक्टर्स की आँखों से भी आंसू बह निकले। आख़िर उसकी उम्र ही क्या थी महज़ 51 वर्ष... लेकिन इतनी छोटी उम्र में भी उसने रिश्तों की अपार पूंजी कमाई जो कई लोग ताउम्र भी नहीं कमा पाते।
भावपूर्ण नमन !

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