नमस्कार,
आज बात व्रत की...
निराहार और निर्जल रहना ही व्रत नहीं
भारतीय संस्कृति में व्रत की सघन परंपरा है। इतने तीज- त्योहार हैं कि पूछिए मत! इसलिए लोग ढेर सारे व्रत भी रखते हैं। व्रत के पीछे का भाव यह कि हम सात्विक रुप से जीवन यापन कर ईश्वर के अत्यंत निकट आ जाते हैं। यहां तक तो ठीक है किंतु हमारे यहां व्रत के नाम पर जमाने भर के व्यंजन बनाने की परंपरा है। किसी भी व्रत के पूर्व अखबारों में अनेक प्रकार की रेसिपी का जिक्र आ जाता है।
भोपाल के एक रेस्तरां ने तो बकायदा नवरात्र पर एक मेन्यू तैयार किया है जिसमें फलाहारी समोसे, पूरी, सब्जी, हलवा सब कुछ मिल रहा है। कुछेक महाशय तो ऐसे हैं कि व्रत के नाम पर इतने तरह के मेवा- मिष्ठान गड़कते हैं कि पूछिए मत। अपना वजन तक बड़ा लेते हैं । समझ नहीं आता आखिर इस तरह के व्रत का औचित्य ही क्या?
इसी तरह कुछ ऐसे लोग भी हैं जो निर्जला और निराहार रहकर व्रत करते हैं। अपने शरीर को आवश्यकता से अधिक कष्ट देना भी तो उचित नहीं है? कोई भी ईश्वर चाहे वह किसी भी रुप में हों वे आपको भूख- प्यास से व्याकुल देखना तो चाहते नहीं हैं। यह आपके संयम की परीक्षा अवश्य हो सकती है। दरअसल व्रत की मूल धारणा भी यही है कि आप कितना संयमित जीवन जीते हैं। अपनी इंद्रियों पर संयम, अपनी वाणी पर संयम, अपने विकारों पर संयम यह करना ही तो व्रत की सच्चे अर्थ में सार्थकता है। यह सभी धर्मों में समान रूप से लागू हो।
सूत्र यह है कि अन्न का त्याग ही व्रत नहीं है, ईश्वर का सामीप्य पाने के और भी उपक्रम हैं। वैसे भी वे सिर्फ आपके भाव के भूखे हैं आपके भूखे रहने के नहीं। किसी के प्रति कुविचार, दुराभाव न रखना संयमित और सात्विक जीवन शैली भी तो एक प्रकार का व्रत ही है।
शुभ मंगल
#व्रत सूत्र
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