मीरा कुमार: बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अनुसूचित जाति के एकमात्र राष्ट्रीय नेता थे
मीरा कुमार: बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अनुसूचित जाति के एकमात्र राष्ट्रीय नेता थे
मीरा कुमार: बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अनुसूचित जाति के एकमात्र राष्ट्रीय नेता थे। उस समय अनुसूचित जाति में उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति बहुत कम थे। जो थे, उन्हें अंग्रेज अपने पक्ष में करने की कोशिश करते थे। बाबूजी को भी बड़े-बड़े प्रलोभन दिए गए — वायसराय की कौंसिल में जगह आदि। लेकिन उन्होंने जेल की यातनाएँ सहना बेहतर समझा।
1940 के असहयोग आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे जेल गए। 10 दिसंबर 1940 को उन्होंने शाहाबाद के कलेक्टर को विशाल सत्याग्रह का नोटिस दिया और गिरफ्तार हुए। 19 अगस्त 1942 को पटना से गिरफ्तार कर उन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया।
महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा था — “जगजीवन राम तपे हुए कंचन की भाँति खरे और सच्चे हैं। मेरा हृदय इनके प्रति आदरपूर्ण प्रशंसा से आपूरित है।”
साक्षात्कारकर्ता: 1937 के प्रांतीय चुनावों में उन्होंने किस प्रकार अंग्रेजों की साजिश को नाकाम किया?
मीरा कुमार: 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने कई प्रांतों में जीत हासिल की, लेकिन कांग्रेस ने अंग्रेज गवर्नरों को सारे अधिकार सौंपने से इनकार कर दिया। तब अंग्रेजों ने बिहार में यूनुस का कठपुतली मंत्रिमंडल बनाया। उन्होंने बाबूजी को और उनके 14 साथियों को शामिल होने के लिए बड़ी-बड़ी पेशकश कीं।
बाबूजी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। यदि वे शामिल हो जाते तो कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलन को भारी क्षति पहुँचती। गांधीजी की पत्रिका ‘हरिजन’ ने 17 अप्रैल 1931 को उनके इस साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
साक्षात्कारकर्ता: संविधान निर्माण में उनकी भूमिका क्या थी?
मीरा कुमार: संविधान सभा में बाबूजी सभी महत्वपूर्ण समितियों के सदस्य थे। उन्होंने संविधान के प्रगतिशील और उदारवादी प्रावधानों को लिखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वे 28 वर्ष की आयु में बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए। बाद में दलित वर्ग संघ की टिकट पर निर्विरोध चुने गए और फिर कांग्रेस में शामिल हुए। अंतरिम सरकार में वे सबसे युवा मंत्री थे और श्रम मंत्री बने।
साक्षात्कारकर्ता: बाबूजी का व्यक्तित्व कैसा था?
मीरा कुमार:मेरे पिता अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे शुद्ध खादी पहनते थे और चाहे जेल में हो या घर पर साधारण चरखे पर स्वयं सूत कातते थे. मद्यपान के सख्त विरोधी थे। उनकी दिनचर्या अनुशासित थी। वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। शिवनारायण सम्प्रदाय में दीक्षित होने के साथ-साथ गुरु रविदास के अनन्य भक्त थे। 12 अप्रैल 1979 को काशी के राजघाट पर उन्होंने गुरु रविदास स्मारक का शिलान्यास किया।
साक्षात्कारकर्ता: उन्होंने देश की सेवा में कौन-कौन से महत्वपूर्ण पद संभाले?
मीरा कुमार: उन्होंने श्रम मंत्री, संचार मंत्री, परिवहन एवं रेल मंत्री, खाद्य एवं कृषि मंत्री, सामुदायिक विकास एवं सहकारिता मंत्री तथा रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले।
रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने सेवानिवृत्त सैनिकों को पुनर्वास दिया, रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया और अन्य विभागों में पूर्व सैनिकों को प्राथमिकता दी।
बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय वे और मेरी माता दोनों सीमा पर जाकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाते थे।
उन्होंने आरक्षण व्यवस्था को मजबूत किया, मंदिरों के द्वार खुलवाए, भूमिहीन किसानों को जमीन दिलाई, शिक्षा के अवसर बढ़ाए और अस्पृश्यता निवारण के लिए निरंतर प्रयास किए। वे हरित क्रांति के सूत्रधार भी थे।
साक्षात्कारकर्ता:अंत में, आज के संदर्भ में बाबूजी का जीवन क्या संदेश देता है?
मीरा कुमार: मेरे पिता महात्मा गांधी के उन उत्कट शिष्यों में से थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक मूल्यों, सिद्धांतों और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
आज के समय में उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यह है कि वे दिखाते हैं — चाहे कितनी भी गरीबी और अपमान हो, उच्च आदर्शों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आत्मसम्मान बनाए रखते हुए राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए।
मुझे विश्वास है कि उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
समापन:
साक्षात्कारकर्ता: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीया मीरा कुमार जी। बाबू जगजीवन राम जी के इस अमूल्य स्मरण और उनके महान योगदान को जानकर हम गौरवान्वित हुए।
मीरा कुमार: आप दोनों का भी धन्यवाद। बाबूजी के आदर्शों को आगे बढ़ाने में आपका योगदान सराहनीय है।
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