कुछ ही मिनटों बाद पूरे देश ने रेडियो पर एक भारी आवाज सुनी “प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अब हमारे बीच नहीं रहे।”
27 मई 1964 दोपहर के करीब 2 बजे का समय। दिल्ली में अचानक सरकारी दफ्तरों के टेलीफोन बजने लगे। ऑल इंडिया रेडियो के कर्मचारी भागते हुए स्टूडियो पहुंचे। संसद भवन के गलियारों में अफरा-तफरी थी।
कुछ ही मिनटों बाद पूरे देश ने रेडियो पर एक भारी आवाज सुनी “प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अब हमारे बीच नहीं रहे।”
उस समय भारत की आबादी करीब 46 करोड़ थी और उनमें से करोड़ों लोगों ने पहली बार महसूस किया कि देश सचमुच अनाथ भी हो सकता है।
सुबह करीब 6 बजकर 20 मिनट पर नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा गांधी से कहा था “पीठ में बहुत दर्द हो रहा है।” कुछ देर बाद उन्होंने धीमी आवाज में कहा “I think I am finished.”
डॉक्टर बी एन चुघ, डॉक्टर तलवार और कई वरिष्ठ चिकित्सक तुरंत पहुंचे। ऑक्सीजन सिलेंडर लगाया गया। इंजेक्शन दिए गए। लेकिन दोपहर 1 बजकर 44 मिनट पर उनकी धड़कन रुक गई। कमरे में इंदिरा गांधी थीं।
गुलजारीलाल नंदा को तुरंत बुलाया गया। उस वक्त तीन मूर्ति भवन के बाहर पहले से ही बेचैनी थी क्योंकि कर्मचारियों को अंदाजा हो चुका था कि मामला गंभीर है।
नेहरू की मौत की खबर सुनते ही तीन मूर्ति भवन में काम करने वाले कई पुराने कर्मचारियों ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया था। उनमें कुछ लोग ऐसे थे जो आजादी से पहले से उनके साथ थे।
एक बुजुर्ग माली बार-बार सिर्फ यही बोल रहा था “पंडित जी चले गए… अब यहां कौन आएगा सुबह बगीचा देखने…”
दिल्ली में उस दिन कई सिनेमाघरों ने अपने शो बीच में रोक दिए थे। कनॉट प्लेस की दुकानें अपने आप बंद होने लगी थीं। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर यात्रियों ने रेडियो के आसपास भीड़ लगा ली थी। गांवों में जहां बिजली भी नहीं थी वहां लोग डाकघर या चौपाल पर रेडियो सुनने जमा हो गए थे।
28 मई 1964 की सुबह तीन मूर्ति भवन से उनकी अंतिम यात्रा निकली। सेना की तोप गाड़ी पर नेहरू का पार्थिव शरीर रखा गया। सफेद फूलों से ढकी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। इंदिरा गांधी बार-बार रो पड़ती थीं। राजीव गांधी उस समय सिर्फ 19 साल के थे। संजय गांधी भी साथ थे।
इतिहासकारों और अखबारों के अनुसार करीब 15 लाख से ज्यादा लोग दिल्ली की सड़कों पर उमड़ पड़े थे। कुछ विदेशी रिपोर्टों में संख्या 20 लाख तक बताई गई। लोग पेड़ों पर चढ़े हुए थे। कई लोग बिजली के खंभों पर बैठ गए थे।
महिलाओं ने अपने बच्चों को कंधों पर उठाकर सिर्फ एक झलक दिखाने की कोशिश की। कई लोग बेहोश हुए। सेना को भीड़ संभालने में भारी दिक्कत हुई।
एक बूढ़ा किसान आगरा से सिर्फ यह कहकर आया था “जिस आदमी ने हमें वोट की ताकत दी उसे आखिरी बार देखना है।”
नेहरू की शवयात्रा में शामिल बड़े नेताओं में राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन, कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, कामराज, इंदिरा गांधी, वी के कृष्ण मेनन और देशभर के मुख्यमंत्री मौजूद थे। दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि भी पहुंचे।
ब्रिटेन से लॉर्ड माउंटबेटन आए। सोवियत संघ और अमेरिका दोनों ने शोक संदेश भेजे। मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने उन्हें एशिया-अफ्रीका की आवाज कहा। यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने कहा कि दुनिया ने शांति का एक बड़ा नेता खो दिया।
नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनकी राख का एक हिस्सा इलाहाबाद के गंगा में बहा दिया जाए और बाकी राख भारत के खेतों के ऊपर हवाई जहाज से बिखेर दी जाए ताकि वह इस मिट्टी में मिल जाएं।
और सचमुच ऐसा किया गया था। भारतीय वायुसेना के विमान से उनकी राख देश के खेतों पर बिखेरी गई थी। शायद इसलिए क्योंकि वह खुद को सिर्फ सत्ता का आदमी नहीं बल्कि इस मिट्टी का हिस्सा मानते थे।
उनकी मौत के बाद देश में सिर्फ सत्ता का संकट नहीं था। लोगों के मन में डर था कि अब भारत का क्या होगा। क्योंकि वही आदमी था जिसने आजादी के बाद टूटा हुआ देश संभाला, संविधान के साथ लोकतंत्र खड़ा किया, IIT, AIIMS, भाखड़ा नांगल, इसरो की शुरुआती सोच, परमाणु कार्यक्रम, बड़े सार्वजनिक उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान और आधुनिक भारत की नींव रखी।
आज लोग सोशल मीडिया पर 10 सेकंड की रील देखकर इतिहास तय करते हैं। लेकिन 1964 का भारत जानता था कि चिता पर सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं लेटा था। वहां आजाद भारत का पहला सपना जल रहा था।
27 मई 1964 भारत पहली बार सचमुच अकेला महसूस कर रहा था।
🙏🙏🌹 शत शत नमन,,,, पंडित जी 🙏🙏

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