मुख्यमंत्री जी, सागर को सिर्फ एक केस फाइल मत बनाइए, अफसरो पर गाज गिराने से पहले आबकारी नीति का "पोस्टमार्टम" कीजिए

 मुख्यमंत्री जी, सागर को सिर्फ एक केस फाइल मत बनाइए, अफसरो पर गाज गिराने से पहले आबकारी नीति का "पोस्टमार्टम"  कीजिए

मौत का कारण अभी जांच में, लेकिन आबकारी व्यवस्था से सवाल साफ—क्या महंगी वैध शराब अवैध बाजार को ताकत दे रही है?

भुवन तोषनीवाल( निमाड़ प्रहरी )

सागर के बंडा से सामने आई संदिग्ध मौतों की घटना ने मध्यप्रदेश को झकझोर दिया है। मौतें जहरीली शराब से हुईं या फूड पॉइजनिंग अथवा किसी अन्य विषाक्तता से—इसका अंतिम फैसला जांच और फॉरेंसिक रिपोर्ट ही करेगी। CMHO ने भी फिलहाल इसे संदेह का मामला बताया है। ऐसे में वैज्ञानिक पुष्टि से पहले मौतों को जहरीली शराब से जोड़ना जल्दबाजी होगी।

लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है— क्या मध्यप्रदेश की आबकारी व्यवस्था को सरकार ने इतना पंगु बना रखा है, वह बाजार की सस्ती महंगी शराब की प्रतिस्पर्धा को कंट्रोल नहीं कर पा रही। हर बार कहानी लगभग एक जैसी होती है। तमाम जिलों से घटना सामने आती है।

इस अपराध के पीछे नीतिगत व्यवस्था भी जिम्मेदार!

अवैध शराब का कारोबार केवल अपराधियों के दम पर नहीं चलता। इसके पीछे मांग, कीमत, मुनाफा, आपूर्ति और निगरानी की पूरी अर्थव्यवस्था होती है।

यदि वैध शराब महंगी है और उसी बाजार में कम कीमत का अवैध विकल्प उपलब्ध है, तो अवैध कारोबार के लिए आर्थिक जमीन तैयार होना स्वाभाविक है। इसका अर्थ यह नहीं कि शराब सस्ती कर दी जाए। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या मौजूदा कीमत और कर संरचना कहीं अनजाने में अवैध बाजार को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ तो नहीं दे रही?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आबकारी विभाग सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है। लेकिन शराब नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि खजाने में कितना राजस्व आया। यदि उसी मांग का एक हिस्सा अवैध बाजार में चला जाए तो सरकार को राजस्व का नुकसान भी होता है और जनस्वास्थ्य का जोखिम भी बढ़ता है।

मुख्यमंत्री जी, सागर को सिर्फ एक केस फाइल मत बनाइए

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने इस घटना को एक व्यापक नीति समीक्षा के अवसर में बदलने का मौका है।

सरकार को पूछना चाहिए—क्या मौजूदा आबकारी नीति अवैध बाजार के लिए कोई आर्थिक खिड़की छोड़ रही है? क्या वैध शराब की कीमत और पड़ोसी राज्यों की कीमतों में अंतर तस्करी को प्रोत्साहित कर रहा है? क्या अवैध शराब के हॉटस्पॉट की वैज्ञानिक मैपिंग उपलब्ध है? क्या संदिग्ध शराब के सैंपल की जांच समयबद्ध तरीके से होती है?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या अगली आबकारी नीति भी पुरानी व्यवस्था को ही नए साल के नाम से दोहराएगी?

सिर्फ बोतल नहीं, पूरी नीति खोलकर देखनी होगी

अवैध शराब की समस्या का समाधान केवल सख्ती में नहीं है। सख्ती जरूरी है, लेकिन उसके साथ कीमत, कर संरचना, लाइसेंसिंग, वैध सप्लाई, अंतरराज्यीय तस्करी, गुणवत्ता नियंत्रण, डिजिटल निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही—सभी की एक साथ समीक्षा जरूरी है।

सागर की घटना का अंतिम कारण जहरीली शराब निकलता है या कोई अन्य विषाक्तता, यह जांच बताएगी। लेकिन घटना ने सरकार के दरवाजे पर खतरे की घंटी जरूर बजा दी है।

आज सवाल सागर का है, कल किसी और जिले का न हो—इसके लिए सिर्फ तस्करों की नहीं, नीति की भी जांच जरूरी है।

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