सरदार सोहनसिंह बुक सेलर

 सरदार सोहनसिंह बुक सेलर 

जब मैंने 13 सितंबर को इंदौर से संतोषी माता के संबंध को लेकर फेस बुक पर लिखा तो आदरणीय कमलेश पारेजी ने महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया दी कि इसे भारत के जन-जन तक पहुंचाने में इंदौर के ही सोहनसिंह बुक सेलर का अप्रतिम योगदान है। यह काफी था मेरे लिये कि मुझे अब क्या करना है। दरअसल,एक पत्रकार को इसी तरह से सूत्र या सिरा


पकड़कर जानकारी की तह तक पहुंचने के जतन करना चाहिये। श्रद्धेय कमलजी दीक्षित(पूर्व संपादक नवभारत)जीवन साहूजी(संस्थापक संपादक,स्वामी युग प्रभात) की पाठशाला में यही मैंने सीखा था। कमलेशजी से वहीं मुलाकात हुई, जो बाद में जारी रही। एक तरह से कमलेशजी ने गुरु मंत्र दिया और मैं पहुंच गया सोहनसिंह बुक सेलर के यहां । इंदौर के राजबाड़ा के पास पुराने बोंझाकेट मार्केट,जो पहले फ्रूट मार्केट था, उसके पास बक्षी गली में यह दुकान है। दुकान क्या,धार्मिक पुस्तकों का संग्रहालय और पूजा सामग्री का भंडार। 

     इस समय संस्थान का काम संभाल रहे हैं लाल बहादुर सिंह खनूजा व उनके छोटे भाई इंद्रजीत सिंह । उनसे पहले सोहनसिंहजी के बड़े बेटे त्रिलोकसिंहजी पिताजी का हाथ बंटाते थे। उन्होंने पिता की विरासत को इस तरह से आगे बढ़ाया कि अब पूरा परिवार ही इसमें लगा है। लाल बहादुरजी से जब संतोषी माता का जिक्र किया तो वे जैसे उस दौर में ही उतर गये। समंदर में गहरे जाकर कैसे कोई कुशल गोताखोर माणिक-मोती निकाल लाता है, वैसे ही उन्होंने सिलसिलेवार बताया कि कैसे इस संस्थान की स्थापना सरदार सोहनसिंहजी ने की। वे विभाजन का दर्द झेलते हुए इंदौर आये थे। उनके माता-पिता उस त्रासदी का शिकार हो गये थे। यहां उन्होंने राजबाड़ा उद्यान में मां अहिल्या देवी की प्रतिमा के नीचे फिल्मी गीतों के पन्ने बेचने शुरू किेया। तब इसका खूब चलन था। फिल्म आने से पहले ही वे बुकलेट आ जातीं और लोग बेहद चाव से उसे पढ़ते। तब रेडियो तो था, लेकिन टीवी,कैसेट प्लेयर जैसे साधन नहीं थे, जो गीतों को सुनने-जानने का आनंद देते।

     वे दिन में यहां बेचते और रात 3-4 बजे के करीब मालवा मिल के गेट के पास दुकान सजाकर बैठ जाते। 4 बजे मिल की पाली छूटती तो मजदूर उसे खरीदते थे। इसमें मजेदार बात यह है कि ये बुकलेट वे स्वयं ही ट्रेडल मशीन पर छापा करते थे। इनका कोई कॉपी राइट नहीं होता था। ये 5-10 पैसे में मिलती थीं। तभी उन्होंने महसूस किया कि इंदौर में धार्मिक पुस्तकें उपलब्ध नहीं होती थीं। गीता प्रेस के कुछ प्रकाशन मिल जाते तो कुछ पार्सल से बुलवाने पड़ते थे। तब उन्होंने अलग-अलग ग्रंथों का अध्ययन कर और दिल्ली,मुंबई से कुछ पुस्तकें बुलवाकर अपने हिसाब से संपादित कर उन्हें भी छापना शुरू कर दिया। वे ग्राहकों को अपेक्षाकृत सस्ती मिल जाती थी। एक तो डाक खर्च नहीं लगता था, दूसरा स्थानीय स्तर पर छपने से भी लागत कम रहती। फिर,बड़े ग्रंथों की बजाए आकार छोटे रहते थे,ताकि ज्यादा कीमत भी न रहे।

     उन दिनों में आल्हा खंड,सिंहासन बत्तीसी,हनुमान चालीसा, रामायण, गीता,महाभारत जैसी धार्मिक पुस्तकें ज्यादा प्रचलित थीं। इनकी छपाई भी वे स्वयं ही करते तो उन्हें बिक्री में सोचना नहीं पड़ता था। लाल बहादुरसिंहजी बताते हैं कि संतोषी माता की कथा कि पुस्तकें तो 1960 के आसपास बिकना प्रारंभ हो चुकी थी। फिल्म तो 1975 में आई। तब 16 पृष्ठ की पुस्तक 13 पैसे में बेचते थे। फिल्म के बाद उसके कथा व गीतों की बिक्री की जैसे बाढ़ ही आ गई । कथा व गीतों की पुस्तकें लाखों की तादाद में बिकती रहीं। कई बार तो दूरदराज भेजने में देर हो जाती, क्योंकि उतनी तादाद में छप नहीं पाती थी। 

     उन्होंने बताया कि जब पिताजी का धार्मिक पुस्तकों के विक्रेता और प्रकाशक के तौर पर नाम-सम्मान हो गया तो अहिल्या ट्रस्ट ने उन्हें इंदौर पंचांग छापने का काम भी दे दिया। इस पंचांग को तत्कालीन राज ज्योतिषी नीलकंठ मंगलजी जोशी तैयार करते थे। उसी दौर में शिव पुराण,शिव चालीसा भी काफी लोकप्रिय थी। चूंकि सोहनसिंहजी को उर्दू का भी ज्ञान था तो उन्होंने उर्दू में रामायण,गीता,हनुमान चालीसा आदि का प्रकाशन भी प्रारंभ कर दिया। हिंदू धर्म ग्रंथों में रुचि रखने वाले उर्दूभाषी पाठक उन्हें खरीदते थे। लाल बहादुरसिंहजी के अनुसार देश में सबसे पहले नर्मदा पुराण का प्रकाशन हमारे संस्थान ने ही किया था। इसी तरह से गीता प्रेस के प्रकाशनों की इंदौर में विधिवत बिक्री भी हमारे यहां से ही हुई । 

     अब लाल बहादुरजी व इंद्रजीत सिंहजी का परिवार संयुक्त रूप से ही रहता है और कारोबार भी साझा है। उन दोनों के बेटे-मनप्रीत,प्रीतम व जसकरण सिंह भी इसी से जुड़े हैं। ऐसे समय जब इंदौर में हिंदी पुस्तकों की दुकानें एक-एक कर बंद हो गई, तब सोहनसिंह बुक सेलर भले ही धार्मिक पुस्तकों के जरिये,लेकिेन अलख जगाए हुए है। करीब 15 हजार से अधिक पुस्तकें एक समय में स्टॉक में रहती हैं। देश में इस समय जो भी धार्मिक प्रकाशन बाजार में आता है तो महानगरों के साथ ही इंदौर में भी उपलब्ध हो जाता है। 

     लाल बहादुर सिंहजी ने एक बात बेहद पते की कही कि सामान्यत: कोई व्यक्ति सभी धर्मों के जितने देवी-देवताओं के नाम व उनसे जुड़े साहित्य के बारे में नहीं जानता,उतने नाम हम दिन-रात उच्चारित करते हैं। इस तरह से हम तो प्रभु नाम सुमिरन से ही अपना जीवन धन्य मानते हैं। ये भी निश्चित ही उस प्रभु की ही लीला है, जो उसने हमें इस काम में पीढ़ियों से लगा रखा है। 

     हम कह सकते हैं कि सरदार सोहनसिंह बुक सेलर प्रतिष्ठान भी इंदौर की प्रमुख पहचान है।

(इंदौर से जुड़ी ऐसी ही प्रामाणिक और यादगार कहानियों का सिलसिला जारी रहेगा।)

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