विदाई बेला


42 वर्ष की सेवा — एक यात्रा, कुछ स्मृतियाँ, बहुत सारा स्नेह


जीवन यात्रा का सत्य

        

“सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।

सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।।

सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।

सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।।

*सदा न मौज बसंत री, सदा न ग्रीष्म भाण।*

*सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।।*

*सदा न काहूँ की रही, गल प्रीतम की बाँह।*

*ढलते-ढलते ढल गई, तरवर की सी छाँह।।”*


*सरल अर्थ~*


जीवन में कुछ भी सदा एक जैसा नहीं रहता।

मित्रों का साथ और राज-पाट हमेशा नहीं रहता। जीवन सदा नहीं रहता और काले बाल भी सदा नहीं रहते।

केतकी का फूल और सावन की ऋतु भी हमेशा नहीं रहती।

न विपत्ति हमेशा रहती है, न सुख हमेशा रहता है।

बसंत की मौज और गर्मी की ऋतु भी बदल जाती है।

जवानी स्थिर नहीं रहती और धन-संपत्ति का मान भी हमेशा नहीं रहता।

किसी का साथ भी सदा नहीं रहता,

यहाँ तक कि प्रियतम की बाँहों का सहारा भी हमेशा नहीं रहता।

अंततः जीवन भी उसी तरह धीरे-धीरे ढल जाता है,

जैसे पेड़ की छाया ढलते-ढलते समाप्त हो जाती है।


*🌿 मेरी 42 वर्ष की यात्रा 🌿*


42 वर्ष पहले शिक्षक बनकर जिस सतराना में आया था,

उसी सतराना में 42 वर्ष की सेवा पूरी कर

अब विदाई की बेला आ गई है।

लेकिन मेरी यह यात्रा केवल सतराना तक सीमित नहीं रही ।।

कलवाना, सोयत, रामगढ़ा, सोसायटी टप्पर, खनपुरा, तजपुरा निपानिया,रामनगर, 

चंदपुरा,दिगबाड़, श्यामुगांव, महागांव, पीपलकोटा, आगरा, इमलाढ़ा, पाढलिया, नंदगांव और राला सहित कई आसपास के गाँवों के बच्चे भी मेरे शिक्षकीय जीवन का हिस्सा बने।

इन वर्षों में मिले बच्चों का स्नेह, साथियों का साथ और ग्रामीण समाज का अपनापन—

मेरे जीवन की अमूल्य पूँजी है।

मैंने हमेशा प्रयास किया कि~

बच्चों का भला हो, विद्यालय का मान बढ़े ।।

और अपने कर्तव्य के साथ कोई समझौता न हो ।।

कभी मेरी बात कड़वी लगी हो तो वह मेरी *स्पष्टता* थी ।।

पर मन में किसी बच्चे के अहित का भाव कभी नहीं रहा ।।

*🌺 सतराना से जुड़ी स्थायी स्मृतियाँ 🌺*

सतराना में 42 वर्षों की सेवा के दौरान,

वर्ष 2017 में *गणेश परिवार मंदिर*, *शीतला माता* एवं *नारियां बाबा* के साथ ही *शिव लिंग* स्थापना का सौभाग्य मिला।

और अब अपनी शिक्षकीय यात्रा के अंतिम पड़ाव पर,

31 अक्टूबर 2026 को *माँ सरस्वती* को श्रद्धापूर्वक भेंट अर्पित कर उनकी एक स्मृति स्थापित करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ ।।

ये स्मृतियाँ मेरे लिए केवल स्थापना नहीं,

बल्कि सतराना से मेरे आत्मीय संबंध और 42 वर्षों की यात्रा की स्थायी निशानी हैं। 🙏


*आज पद से विदा हो रहा हूँ,

पर सतराना से नहीं।*

यहाँ बिताए 42 वर्ष

मेरी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे।


*🙏 अंत में बस इतना… 🙏*


“आपका स्नेह ही मेरी सबसे बड़ी विदाई है।”

सादर

*अखिलेश गुप्ता*

शिक्षक

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ( माध्यमिक - विभाग) सतराना

31 अक्टूबर 2026

🌿

*“ढलते-ढलते ढल गई,*

*तरवर की सी छाँह।”*

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